मैं अल्मोड़ा के एक छोटे से गाँव से आता हूँ। मेरी 12वीं तक की पढ़ाई भी वहीं हुई और अब दिल्ली में आईटी सेक्टर में नौकरी करता हूँ। जब हम छोटे थे, हमारी दादी हमें कहानियाँ सुनाया करती थीं। वो कहानियाँ हमारे बचपन का एक अहम हिस्सा थीं। उन्हीं में से एक कहानी थी घिनौड़ी और घिनौड़ा की, जिसे सुनकर हम भावुक हो जाते थे।
गाँव के घरों में पक्षियों का बसेरा
हमारे पहाड़ों में लोग सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि पक्षियों और जानवरों के लिए भी जगह रखते हैं। पुराने घरों की खिड़कियों, छज्जों और दीवारों में ऐसी जगह बनाई जाती थी, जहाँ गौरैया और अन्य पक्षी अपने घोंसले बना सकें। हमारी दादी हमें कहानियाँ सुनाया करती थीं एक घर में एक जोड़ा रहता था—घिनौड़ी (गौरैया मादा) और घिनौड़ा (गौरैया नर)।
दोनों बहुत खुश रहते थे। घिनौड़ा दिनभर उड़कर खाने की तलाश करता और घिनौड़ी घर संभालती। धीरे-धीरे उनके बच्चे भी हुए, जिससे उनका जीवन और भी प्यारा हो गया। दोनों बच्चों की देखभाल में लगे रहते, उनके लिए दाना-पानी लाते, और अपना घोंसला प्यार से सजाते।
एक दिन घिनौड़ी की फरमाइश
एक दिन घिनौड़ी ने बड़े प्यार से कहा,
“घिनौड़ा-घिनौड़ा! आज खिचड़ी बनाएंगे, मैं चावल लाती हूँ, तुम मिर्च ले आओ।”
घिनौड़ा मुस्कुराया और बोला,
“ठीक है घिनौड़ी, मैं सबसे अच्छी मिर्च लेकर आता हूँ!”
घिनौड़ा उड़ चला और खाना तलाशने लगा। तभी उसने एक घर के बाहर लाल-लाल मिर्च रखी देखी। वह बहुत खुश हुआ और मन ही मन सोचा,
“आज की खिचड़ी तो बहुत स्वादिष्ट बनेगी!”
जैसे ही उसने मिर्च उठाने के लिए अपनी चोंच बढ़ाई, उसका पैर जाल में फँस गया। घिनौड़ा हक्का-बक्का रह गया। उसने निकलने की बहुत कोशिश की, लेकिन जितना छटपटाता, जाल उतना कसता गया।
अब उसे एहसास हुआ कि वह फँस चुका है और अब उसका बच पाना मुश्किल है। धीरे-धीरे उसकी ताकत खत्म होने लगी और वह मरते-मरते रो पड़ा,
“घिनौड़ी, घिनौड़ी! आज अपनी खिचड़ी अकेले ही खा लेना, क्योंकि अब मैं मिर्च नहीं ला पाऊँगा।”
इतना कहते ही उसकी आँखें बंद हो गईं और वह हमेशा के लिए शांत हो गया।
घिनौड़ी का इंतजार और दिल दहला देने वाला सच
इधर घिनौड़ी घर पर बैठी इंतजार कर रही थी। उसे लगा घिनौड़ा जल्दी ही मिर्च लेकर आ जाएगा, लेकिन जब बहुत देर हो गई तो उसका मन घबरा गया। वह अपने बच्चों को छोड़कर घिनौड़ा को ढूँढने निकली।
कुछ देर उड़ने के बाद उसने देखा कि घिनौड़ा एक जाल में फँसा पड़ा है और उसकी जान जा चुकी है। यह देख घिनौड़ी की आँखों से आंसू बहने लगे। उसने घिनौड़ा को बार-बार पुकारा, लेकिन अब वह कोई जवाब नहीं दे सकता था।
घिनौड़ी का अकेलापन और संघर्ष
घिनौड़ी टूट चुकी थी, लेकिन अपने बच्चों के लिए उसे जीना था। वह भारी मन से घर लौटी और अपने बच्चों को पालने लगी। पहले जहाँ उनका घर खुशियों से भरा रहता था, अब वहाँ सिर्फ सन्नाटा था। घिनौड़ी दिनभर अपने बच्चों के लिए दाना-पानी लाती और रात को अकेले चुपचाप बैठी घिनौड़ा को याद करती।
इस कहानी की सीख
मेरी दादी हमें यह कहानी हमेशा बड़े प्यार और करुणा से सुनाती थीं। इस कहानी से हमने सीखा कि हर जीव का एक परिवार होता है, उसकी भावनाएँ होती हैं, और हमें कभी भी किसी भी पक्षी या जानवर को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए। इस कहानी का हमारे दिल पर इतना गहरा असर हुआ कि हम कभी किसी पक्षी को पत्थर नहीं मारते और न ही किसी जीव को नुकसान पहुँचाते।
क्या आपको भी अपने बचपन में ऐसी कहानियाँ सुनने को मिली हैं? अपनी राय जरूर दें!