नमस्कार दोस्तों, आज मैं आप सभी को उत्तराखंड में मनाए जाने वाले एक खास त्योहार फूल देही के बारे में बताने जा रहा हूँ। यह त्योहार न केवल हमारी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा हुआ है, बल्कि बचपन की अनगिनत यादों को भी समेटे हुए है। इस त्योहार से जुड़ी कई मान्यताएँ और कहानियाँ भी प्रचलित हैं, जिन्हें सुनकर बचपन में हम सभी रोमांचित और कभी-कभी डर भी जाते थे।
बचपन की वो सुनहरी यादें
जब मैं अपने गाँव में फूल देही का त्योहार मनाता था, तब हमारे लिए यह एक बहुत खास मौका होता था। त्योहार से एक दिन पहले ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। सबसे पहले हम अपनी टोकरी (थुपहिर) को निकालते, जिसे मेरी माँ बड़े प्यार से गोबर और मिट्टी से लीपकर तैयार करती थीं। स्कूल से आते ही मैं भी इस तैयारी में जुट जाता था। हमारी टोली के सभी दोस्त मिलकर अपनी-अपनी टोकरी सजाते और उन्हें खास बनाने की कोशिश करते।
मेरी टोकरी हमेशा सबसे अलग होती थी क्योंकि मैंने उसमें पकड़ने के लिए एक रस्सी बाँध रखी थी, जिससे वह दूसरों की टोकरी से अलग दिखती थी। मेरी दीदी हमेशा हमारे लिए कुछ खास फूल लेकर आती थीं, जिन्हें पाकर हमें बहुत खुशी होती थी। फिर शाम होते ही पूरे गाँव के बच्चे अपनी-अपनी टोकरी लेकर फूल लेने निकलते थे।
गाँव में हर किसी का अपना एक समूह होता था, और हमारे समूह में करीब 12 लोग थे। हमारी टोकरी में माँ द्वारा बनाए गए एपड़ (Art) , जिनमें चावल और एक रुपये का सिक्का रखा जाता था। फिर हम सब अच्छे कपड़े पहनकर, माथे पर टीका लगाकर, फूल लेने के लिए निकल पड़ते।
गाँव में पहले से ही पता होता था कि कहाँ-कहाँ फूलों के पेड़ हैं, और हम उसी दिशा में बढ़ने लगते। लेकिन इसी बीच हमें एक पुरानी मान्यता याद आ जाती थी, जिसे सुनकर हम थोड़ा घबरा जाते।
बचपन का वह डरावना किस्सा
बचपन में हमारी माँ हमें एक कहानी सुनाया करती थीं कि हमारे गाँव से दूर एक भाई-बहन फूल लेने के लिए जंगल में गए थे, लेकिन वहाँ कोई बाबा उन्हें पकड़कर ले गया। उसके बाद से वे दोनों कभी वापस नहीं आए। यह कहानी हमें इतनी डराती थी कि जब भी हम ज्यादा दूर जाने की कोशिश करते, तो एक-दूसरे को यह किस्सा याद दिलाकर डराने लगते। लेकिन फिर भी, हँसी-मज़ाक करते हुए हम फूल इकट्ठा करने का मज़ा लेते थे और जल्द से जल्द घर लौट आते थे।
सुबह की पूजा और प्रसाद का आनंद

रात में भी हम अपनी टोकरी को बार-बार देखते रहते और कभी-कभी तो चुपके से दीदी की टोकरी से फूल लेकर अपनी टोकरी में डाल देते। सुबह होने का हमें बेसब्री से इंतजार रहता था, क्योंकि फिर हमें घर के आँगन में रखे फूलों को तोड़कर पूजा के लिए तैयार करना होता था।
सुबह होते ही हम जल्दी से उठकर चाय पीते और अपनी टोकरियों को घर के पास रख देते। फिर हम पूरे गाँव में फूल बाँटते, और हर घर से हमें प्रसाद के रूप में गुड़, पकौड़ी, चावल, पूरी या अन्य पकवान मिलते। सबसे ऊपर वाले घर से फूल देने की शुरुआत होती थी, और सबसे बड़ी बहन को पहले पूरी दी जाती थी।
हमें यह जानने में सबसे ज्यादा मज़ा आता था कि हमारी टोकरी में कितनी पूरियाँ और पकवान भरे हैं। रास्ते में चलते-चलते हम पकवान खाते जाते, और जब घर पहुँचते तो सबको बताते कि हमें कितनी पूरियाँ मिलीं। फिर माँ को दिखाते और खुशी-खुशी मीठी खीर और पूरियाँ खाते।
फूल देही का असली आनंद
इस तरह फूल देही का त्योहार पूरे गाँव में खुशी और उत्साह से मनाया जाता था। यह त्योहार हमें न केवल प्रकृति से जोड़ता था बल्कि भाई-बहनों और दोस्तों के साथ बिताए गए हँसी-खुशी के पलों को भी सहेजता था।
आज भी जब मैं अपने बचपन के इन पलों को याद करता हूँ, तो एक अजीब-सी खुशी और nostalgia महसूस करता हूँ। अब समय बदल गया है, लेकिन यह त्योहार और इससे जुड़ी यादें हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगी।
“फूल-फूल तुम्हारा भंडार भरी, जो हमारी टोकरी भरी!”
(अर्थात्— घर का भंडार पकवानों से भरा रहे!)” – पकवानों की टोकरी भी भरती रहे!