साहस और बुद्धिमानी की मिसाल: Shahu और अजगर की Anshuni Kahani

साहस और बुद्धिमानी की मिसाल: Shahu और अजगर की Anshuni Kahani

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सभी दोस्तों को मेरा सादर नमस्कार!
आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जो मेरे बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है। ठंडी सर्दियों की वे रातें, जब पूरा घर धुंध से घिरा होता, कोयले की धीमी आँच जल रही होती और दादाजी अपने हुक्के के कश लेते हुए हमें अपने जीवन के अनमोल अनुभवों और कहानियों की दुनिया में ले जाते थे। उन दिनों, जब हम छोटे थे, हमारा बचपन किताबी दुनिया और किस्सों की गलियों के बीच कहीं अटका रहता था।

म|ता और मेरे पिता नीचे वाले कमरे में खाना बनाया करते थे, और मेरे दादाजी हुक्का पीते हुए एक कोने में बैठे रहते। हम किताबों में आँखें गड़ाए रखते, लेकिन असल में मन कहीं और होता था। आँखें किताब में और दिमाग किसी और दुनिया में भटकता रहता। मैं धीरे से दादाजी के पास जाकर बैठ जाता और कहता, “दादाजी, एक कहानी सुनाइए ना!”

वे हमेशा मुझे टोकते, “पहले पढ़ाई करो, फिर कहानी मिलेगी।”
लेकिन जब मेरी बहन भी जिद करती, तो वे हंसकर मान जाते और कहने लगते, “अच्छा सुनो, एक ऐसे इंसान की कहानी, जिसकी हिम्मत की मिसाल आज भी दी जाती है…”

साहू – लकड़ी का कारीगर, पर हिम्मत का बादशाह

किसी समय की बात है, पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में एक साधारण सा आदमी रहता था, नाम था साहू। साहू का काम था लकड़ी से औजार बनाना – पहाड़ी हल और हल में लगने वाले औजार (नसुद, जो, जू)। वह लकड़ी से दरवाजे, खिड़कियाँ और अन्य चीजें भी बनाता था। उसका हुनर बेमिसाल था, लेकिन उससे भी बड़ी चीज़ थी उसकी हिम्मत। गाँव-गाँव में उसके साहस के किस्से सुनाए जाते थे। लोग कहते थे कि “साहू से बढ़कर मेहनती और निडर आदमी हमने नहीं देखा!”

एक दिन पड़ोसी गाँव के लोगों ने साहू से 15 नसुद बनाने का अनुरोध किया। साहू बहुत खुश हुआ, क्योंकि यह उसके काम का सम्मान था। लेकिन गाँववालों को ये औजार बहुत जल्दी चाहिए थे। साहू ने दिन-रात मेहनत की और कुछ ही दिनों में सभी नसुद तैयार कर लिए।

काम पूरा होते ही उसने अपनी पत्नी से कहा, “तुम बाज़ार से सामान ले आना, मैं गाँव जाकर पैसे लेकर आउँगा और वापसी में तुमसे बाज़ार में मिलूँगा।” उसकी पत्नी ने सिर हिलाया और कहा, “ठीक है, लेकिन जल्दी आना!”

साहू ने 15 नसुद को एक बड़े बोरे में रखा और अपनी यात्रा शुरू की। रास्ते में वह कुछ देर आराम करने के लिए एक पुराने पेड़ के नीचे बैठा। पहाड़ियों की ठंडी हवा चल रही थी। उसने बोरा जमीन पर रखा, उसमें से खाना निकाला और खाने लगा। लेकिन जैसे ही वह पहला कौर मुँह में डालने वाला था, उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके पैरों के इर्द-गिर्द कुछ लिपट रहा है…!

साहू ने नीचे देखा और उसकी रूह काँप गई!
एक विशालकाय अजगर उसकी टांगों को जकड़ चुका था। अजगर की आँखों में मौत की परछाई थी। साहू ने अपनी पूरी ताकत लगाई, पैर झटके, लेकिन अजगर की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह हिल भी नहीं पा रहा था। साँसें तेज़ हो गईं, दिल की धड़कनें बढ़ गईं। उसे यकीन हो गया कि अगर जल्द ही कुछ नहीं किया, तो उसका बच पाना नामुमकिन है।

लेकिन साहू घबराया नहीं। उसका दिमाग तेज़ी से काम करने लगा। उसने झटपट अपना बोरा खोला और उसमें से एक नसुद निकाला और अजगर के मुँह में डाल दिया!

अजगर ने तुरंत उसे निगल लिया!

पर साहू यहीं नहीं रुका। उसने एक-एक करके 15 नसुद अजगर के मुँह में डाल दिए। अजगर को पहले तो कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जैसे ही नसुद उसके पेट में चुभने लगे, वह तड़पने लगा।

अब अजगर छटपटाने लगा। दर्द से बेहाल होकर उसने खुद को बचाने के लिए पास के एक विशाल पेड़ को कसकर लपेट लिया और अपनी ताकत से खुद को निचोड़ने लगा। जैसे-जैसे वह और ज़ोर लगाता गया, उसके पेट में रखे नसुद की धार उसे अंदर से चीरने लगी। आखिरकार, अजगर का पेट फट गया और नसुद बाहर बिखर गए!

गाँव में लौटकर सम्मान

साहू ने राहत की सांस ली। वह पसीने से लथपथ था, लेकिन जिंदा था। उसने अपने औजार समेटे, बोरे में डाले और गाँव की ओर बढ़ चला।

गाँव पहुँचने के बाद, उसने गाँववालों को नसुद सौंपे और जब उन्होंने पूरी घटना सुनी, तो सब हैरान रह गए! कोई यकीन नहीं कर पा रहा था कि साहू अकेले ही मौत के मुँह से बाहर आ गया।

गाँव के बुज़ुर्गों ने कहा, “ऐसे हिम्मती इंसान बिरले ही होते हैं। साहू, तुमने साबित कर दिया कि असली ताकत शरीर की नहीं, बल्कि दिमाग और हौसले की होती है!”

गाँववालों ने उसका सम्मान किया और उसकी बहादुरी के किस्से दूर-दूर तक फैल गए।

कहानी का सबक

दादाजी की यह कहानी हमें सिखाती थी कि डर से बड़ा कोई दुश्मन नहीं होता, और हिम्मत से बड़ी कोई ताकत नहीं होती। अगर हम हिम्मत से काम लें और सही वक्त पर सही निर्णय लें, तो किसी भी संकट से बाहर निकला जा सकता है।

दादाजी अपनी कहानी खत्म करने के बाद हमें प्यार से देखते और कहते,
“अब बताओ, तुम्हारे अंदर भी साहू जैसी हिम्मत है?”

यादें जो हमेशा रहेंगी

आज भी जब ठंडी सर्दियों की रातें आती हैं, जब कोयले की आँच जलती है और धुंध में दूर कहीं से किसी के हुक्के की महक आती है, तो मुझे दादाजी की वो कहानियाँ याद आ जाती हैं… और लगता है जैसे साहू का हौसला अब भी पहाड़ों की हवा में जिंदा है।

Deepak Sundriyal

अपण पहाड़, अपण गाथा